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Tuesday, 21 December 2010

!! यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे... !!



कौन कहता हैं, कि प्रभु अपने भक्तों के घर नहीं आते... त्रिलोकी के नाथ श्याम प्रभु तो इतने दयालु और कृपालु कि एक जाट की अविरल शुद्ध भक्ति को देख एवं उसके प्रेमावशीभूत हो उनके घर एक हल चलाने वाले 'हाली' के रूप में प्रकट हो जाते है और उस जाट के सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करते है... सही में प्रभु की माया को कोई नहीं समझ पाया है...


श्री खाटूश्याम जी के वयोवृद्ध श्री श्याम भक्त "श्रद्धेय श्री सोहनलाल जी लोहाकार" ने अपने अंतर्मन के भावों से प्रभु की इस लीला का गायन राजस्थानी भाषा में बहुत ही आलौकिक ढंग से किया है... आइये हम सब भी इन भावों का रसास्वादन करे...




कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...
कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



सौ बीघा को खेत जाट कै, श्यम भरोसे खेती रे...
आधा मैं तो गयूं चणा, आधा म दाना, मेथी रे...
बिना बाड़ को खेत ह म्हारो, श्याम रुखाली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



भूरी भैंस चमकणी जाट कै, दो बकरी दो नारा रे...
बिना बाड़ को बाज्या म, बांध्यो न्यारा न्यारा रे...
आवे चोर जद उब्यों दीखे, काड्डे गाली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



बाजरे की रोटी खावे, ऊपर घी को लसको रे...
पालक की तरकारी खावे, भर मूली को बटको रे...
छाछ राबड़ी को करे कलेवो, भर भर थाली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...
 


कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



जाट-जाटणी  निर्भय सोवे, सोवे छोरा-छोरी रे...
श्यामधणी पहरे के ऊपर, कैया होवे चोरी रे...
आवे चोर लगावे चक्कर, जावे खाली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



निर्धन जाट को छ्परो छायो, लक्षी बाँध खिचायो रे...
चेजो बण चिनवा लाग्यो, हाथा ही गारो गायों रे...
बण दियो घर जड़ दियो तालो, दे गयो ताली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



सोहनलाल लोहाकार कहे, यो घर भक्तां क आवे रे...
धाबलिये री औट बैठ क, श्याम खीचड़ो खावे रे...
भक्तां के संग नाचे गावे, दे दे ताली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...
 


कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...
कुण जाणे या माया श्याम की अजब निराली रे...
यो त्रिलोकी को नाथ जाट कै, बण गयी हाली रे...



!! जय जय मोरवीनंदन, जय जय बाबा श्याम !!
!! काम अधुरो पुरो करज्यो, सब भक्तां को श्याम !!
!! जय जय शीश के दानी, जय जय खाटू धाम !!
!! म्हे आया शरण तिहारी, शरण म अपणे लेलो श्याम !!


भाव के रचियता :  "श्री सोहनलाल लोहाकार जी"

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थे भी एक बार श्याम बाबा जी रो जयकारो प्रेम सुं लगाओ...

!! श्यामधणी सरकार की जय !!
!! शीश के दानी की जय !!
!! खाटू नरेश की जय !!
!! लखदातार की जय !!
!! हारे के सहारे की जय !!
!! लीले के असवार की जय !!
!! श्री मोरवीनंदन श्यामजी की जय !!

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